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साली संग रसीली चु@@ई


साली संग रसीली चु@@ई—>

उस रात घर में एक अजीब सी खामोशी और गर्माहट घुली हुई थी। समीर सोफे पर बैठा टीवी देख रहा था, लेकिन उसका ध्यान बार-बार रसोई की तरफ जा रहा था जहाँ उसकी साली कविता खाना गर्म कर रही थी। समीर की पत्नी ऋतु पिछले चार दिनों से अपने मायके गई हुई थी और पीछे घर की जिम्मेदारी और समीर का ख्याल रखने के लिए उसने अपनी छोटी बहन कविता को भेज दिया था। कविता की उम्र लगभग चौबीस साल थी और उसका यौवन इस समय अपने पूरे उफान पर था। वह दिखने में ऋतु से भी कहीं ज्यादा आकर्षक और गठीले बदन वाली थी। समीर ने महसूस किया कि जब से कविता इस घर में आई थी, उसके मन के अंदर एक दबी हुई कुलबुलाहट जाग उठी थी जिसे वह चाहकर भी दबा नहीं पा रहा था।

कविता जब रसोई से बाहर आई, तो समीर की सांसें थम सी गईं। उसने एक बहुत ही बारीक और पारदर्शी रेशमी नाइटी पहनी हुई थी, जिसके नीचे उसने कुछ भी नहीं पहना था। उसके शरीर की बनावट किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी। उसके छाती पर उभरे हुए दो बड़े और गोल-मटोल रसीले तरबूज उस पतले कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे। जैसे-जैसे वह चल रही थी, उसके तरबूज एक लय में ऊपर-नीचे हो रहे थे और उनके बीच की गहरी घाटी साफ नजर आ रही थी। कविता का पिछवाड़ा भी काफी चौड़ा और मांसल था, जो हर कदम के साथ समीर की धड़कनें बढ़ा रहा था। समीर ने अपनी नजरें चुराने की कोशिश की, लेकिन कविता के गोरे बदन की चमक उसे अपनी ओर खींच रही थी।

समीर के पास आकर कविता बैठ गई और धीरे से बोली, ‘जीजू, आज रात बहुत ज्यादा गर्मी है, एसी भी ठीक से काम नहीं कर रहा है क्या?’ उसकी आवाज में एक अजीब सी थराहट थी जिसने समीर के शरीर के अंदर एक लहर सी दौड़ा दी। समीर ने उसकी ओर देखा और पाया कि उसकी नाइटी के ऊपर से ही उसके मटर जैसे दाने साफ उभर आए थे, जो शायद ठंडक की वजह से नहीं बल्कि किसी और उत्तेजना की वजह से सख्त हो गए थे। समीर की नसों में खून का बहाव तेज होने लगा और उसके पाजामे के अंदर उसका सोता हुआ खीरा धीरे-धीरे सिर उठाने लगा। वह लम्बा और सख्त होने की कोशिश कर रहा था, जैसे उसे अपनी मंजिल का अहसास हो गया हो।

दोनों के बीच एक गहरा मौन छा गया, लेकिन उनकी सांसों की आवाजें सब कुछ बयां कर रही थीं। समीर ने हिम्मत जुटाकर अपना हाथ कविता के कंधे पर रखा। कविता ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वह और करीब खिसक आई। समीर के हाथ की उंगलियां धीरे से सरकते हुए उसके गले से नीचे उतरीं और उसके तरबूजों के ऊपरी हिस्से को छूने लगीं। कविता के मुंह से एक धीमी सी आह निकली और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। समीर ने महसूस किया कि उसकी त्वचा मखमल जैसी कोमल और रेशमी है। उसने धीरे से अपना चेहरा कविता के चेहरे के पास लाया और उसके गुलाबी होंठों को अपने होंठों में भर लिया। वह जामुन जैसा मीठा रस चखने लगा, जैसे कोई प्यासा सदियों बाद पानी पी रहा हो।

उनकी जुबानें एक-दूसरे से टकरा रही थीं और कमरे में सिर्फ उनके चुंबन की आवाज गूंज रही थी। समीर का हाथ अब पूरी तरह से कविता के तरबूजों पर था, जिन्हें वह अपनी हथेलियों में भरकर मसलने लगा था। कविता ने समीर की शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए और जल्द ही दोनों एक-दूसरे के जिस्म की खुशबू में डूब गए। समीर ने उसे गोद में उठाया और बेडरूम की ओर बढ़ गया। बिस्तर पर लिटाते ही उसने कविता की नाइटी ऊपर सरका दी। अब उसके सामने उसकी जवां साली का पूरा नग्न बदन था। उसकी जांघों के बीच की गहरी खाई काले और घने बालों से ढकी हुई थी, जहाँ से एक पारदर्शी रस की पतली लकीर निकल रही थी।

समीर ने अपना सख्त और गरम खीरा बाहर निकाला, जो अब अपनी पूरी लम्बाई और मोटाई में तन चुका था। कविता ने जब उस भारी और वजनी खीरे को देखा, तो उसकी आँखें फैल गईं। उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उस खीरे को पकड़ लिया। उसकी उंगलियां उस पर रेंगने लगीं और उसने उसे अपने मुंह में भर लिया। वह बड़ी शिद्दत से खीरा चूसने लगी, जैसे वह उसका पसंदीदा फल हो। समीर को ऐसा लग रहा था जैसे स्वर्ग का सुख उसे यहीं मिल गया हो। उसने कविता के सिर को पकड़ा और उसे गहराई तक चूसने का मौका दिया। कविता के मुंह की गर्मी और उसकी जीभ का स्पर्श समीर को पागल कर रहा था।

कुछ देर बाद समीर ने उसे घुमाया और वह पिछवाड़े से खोदने की पोजीशन में आ गई। उसने अपना भारी पिछवाड़ा समीर की ओर कर दिया, जो अब और भी ज्यादा कामुक लग रहा था। समीर ने अपनी उंगलियों से उसकी खाई के बालों को सहलाया और फिर एक उंगली धीरे से खाई के अंदर डाल दी। खाई पूरी तरह से गीली और फिसलन भरी हो चुकी थी। उंगली से खोदना शुरू करते ही कविता जोर-जोर से कराहने लगी। ‘ओह जीजू, बहुत मजा आ रहा है, अब और इंतज़ार नहीं होता, मुझे पूरा खोद दो।’ उसकी यह मांग सुनकर समीर का जोश सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने अपने खीरे की नोक को उसकी खाई के मुहाने पर रखा और एक ही धक्के में उसे अंदर उतार दिया।

कविता के मुंह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि चरम आनंद की थी। समीर ने अपनी पकड़ उसकी कमर पर मजबूत की और धीरे-धीरे सामने से खोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ उसका खीरा कविता की गहराई को नाप रहा था। कमरे में मांस के मांस से टकराने की चप-चप की आवाज गूंज रही थी। समीर की गति बढ़ती जा रही थी और कविता अपनी पीठ धनुष की तरह मोड़कर हर धक्के को गहराई तक महसूस कर रही थी। समीर ने उसके तरबूजों को अपने हाथों में जकड़ लिया और उनके मटर जैसे सिरों को अपने दांतों से हल्के से कुतरने लगा। यह खुदाई अब बहुत ही दमदार और जुनून भरी हो चुकी थी।

समीर और कविता दोनों पसीने से तरबतर थे। कविता के शब्द लड़खड़ा रहे थे, ‘हां… जीजू… और तेज… आज मुझे पूरा खत्म कर दो… सारा रस निकाल दो मेरा…’ समीर ने उसकी टांगों को अपने कंधों पर रखा और पूरी ताकत से खुदाई करने लगा। उसका खीरा अब उसकी खाई की आखिरी दीवार तक चोट कर रहा था। कविता के शरीर में कंपन शुरू हो गया और उसकी खाई की दीवारें समीर के खीरे को कसने लगीं। कुछ ही पलों में कविता का शरीर अकड़ गया और उसकी खाई से रसीला झरना फूट पड़ा। उसका रस निकलते ही समीर ने भी अपनी गति बढ़ाई और अपना सारा गरम सफेद रस उसकी गहराई में उड़ेल दिया।

खुदाई खत्म होने के बाद दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए। समीर का खीरा अब शांत होकर बाहर आ चुका था, लेकिन कविता की खाई अभी भी धड़क रही थी। दोनों की सांसें अब भी तेज थीं और जिस्म पसीने की खुशबू और कामुकता की गंध से महक रहा था। कविता ने समीर के सीने पर अपना सिर रखा और धीरे से कहा, ‘जीजू, आपने तो मुझे आज तृप्त कर दिया, ऐसी खुदाई मैंने कभी नहीं सोची थी।’ समीर ने उसके माथे को चूमा और महसूस किया कि यह शारीरिक मिलन केवल वासना नहीं, बल्कि एक गहरे भावनात्मक जुड़ाव की शुरुआत थी। उस रात के बाद उनके बीच का रिश्ता हमेशा के लिए बदल गया था, जो अब और भी ज्यादा गहरा और राजदाराना हो चुका था।

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