कविता ३४ साल की एक बेहद आकर्षक और सुडौल महिला थी, जिसके बदन की बनावट किसी भी मर्द का मन विचलित करने के लिए काफी थी। कविता की काया में एक गजब का उभार था; उसके तरबूज इतने बड़े और कसरती थे कि साड़ी का ब्लाउज हमेशा उन पर कसा हुआ रहता था। जब वह चलती थी, तो उसके पिछवाड़े की थिरकन देखने वाले की धड़कनें बढ़ा देती थी। कविता के पति अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहते थे, जिसकी वजह से उसके जीवन में एक गहरा सूनापन और शरीर में एक अनकही तड़प घर कर गई थी। उसकी रेशमी त्वचा और आँखों की गहराई में एक ऐसी प्यास छिपी थी, जिसे बुझाने वाला कोई पास नहीं था। वह अक्सर अपनी बालकनी में खड़ी होकर दूर क्षितिज को निहारती और अपने अकेलेपन को महसूस करती थी।
रोहन, जो कि अभी २५ साल का एक गबरू जवान था, हाल ही में कविता के बगल वाले फ्लैट में रहने आया था। रोहन का शरीर कसरती था और उसके चेहरे पर एक भोलापन और मर्दानगी का अनोखा संगम था। पहली ही मुलाकात में जब कविता ने रोहन को देखा, तो उसके दिल की धड़कन तेज हो गई थी। रोहन भी कविता की मादक देह को देखकर दंग रह गया था। वह अक्सर कविता को चोरी-छिपे देखा करता था, खासकर तब जब वह गीले बालों के साथ बालकनी में कपड़े सुखाती थी। कविता को भी इस बात का अहसास था कि पड़ोस का यह जवान लड़का उस पर नजरें गड़ाए रहता है, और अजीब बात यह थी कि उसे यह सब बुरा नहीं लगता था, बल्कि उसके अंदर एक अजीब सी सिहरन पैदा करता था।
एक शाम की बात है, जब बाहर मद्धम रोशनी फैली हुई थी और आसमान में काले बादल छाए थे। कविता के घर की पाइपलाइन में कुछ खराबी आ गई थी और पानी किचन की फर्श पर फैल रहा था। उसने हिचकिचाते हुए रोहन का दरवाजा खटखटाया और मदद मांगी। रोहन तुरंत तैयार हो गया और कविता के घर चला आया। काम करते हुए रोहन की बनियान पसीने से भीग गई थी और उसके बाजू की मांसपेशियां साफ चमक रही थीं। कविता उसे गौर से देख रही थी और उसकी नजरें बार-बार रोहन के कसरती बदन पर जा टिकती थीं। माहौल में एक अजीब सी गर्मी बढ़ने लगी थी, जो केवल पाइप ठीक होने से नहीं बुझने वाली थी।
पाइप ठीक करते समय अचानक पानी का एक फव्वारा छूटा और कविता पूरी तरह भीग गई। उसकी पतली सूती साड़ी उसके बदन से चिपक गई, जिससे उसके तरबूजों का आकार और उन पर उभरे छोटे-छोटे मटर बिल्कुल साफ नजर आने लगे। रोहन की नजरें जैसे जम सी गईं। कविता ने शर्माते हुए अपनी साड़ी ठीक करने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखों में भी वही चाहत थी जो रोहन की आँखों में धधक रही थी। रोहन ने धीरे से हाथ बढ़ाया और कविता की भीगी हुई बांह को छुआ। उस स्पर्श में एक बिजली सी थी जिसने दोनों के शरीरों को झकझोर कर रख दिया। कविता की सांसें तेज चलने लगीं और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
रोहन ने हौले से कविता को अपनी बांहों में भर लिया और उसके चेहरे को अपने हाथों में ले लिया। उसने कविता के गुलाबी होंठों पर अपने होंठ रख दिए और एक गहरे रसपान की शुरुआत हुई। कविता ने भी अपनी बांहें रोहन की गर्दन में डाल दीं और उसके करीब आ गई। रोहन का हाथ कविता की पीठ से फिसलते हुए उसके भारी पिछवाड़े पर जा टिका, जिसे उसने बड़े प्यार से सहलाया। दोनों के बीच की झिझक अब पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। कविता की आहें कमरे की खामोशी को चीर रही थीं। रोहन ने धीरे से कविता की साड़ी का पल्लू नीचे गिरा दिया, जिससे उसके विशाल तरबूज अब केवल एक पतले कपड़े के अंदर कैद रह गए थे।
रोहन ने अपनी जुबान से कविता की गर्दन और उसके कंधों को सहलाना शुरू किया। कविता के मुँह से सिसकारियां निकलने लगीं जब रोहन ने उसके तरबूजों के ऊपर के मटर को अपने होंठों में ले लिया। कविता का शरीर कामुकता के चरम की ओर बढ़ रहा था। उसने रोहन की पैंट की जिप खोली और उसके अंदर छिपे हुए कसरती और सख्त खीरा को बाहर निकाला। खीरा देखते ही कविता की आँखें फटी रह गईं, वह काफी बड़ा और मजबूत था। उसने धीरे से उस खीरा को अपने मुँह में लिया और उसका स्वाद लेने लगी। रोहन को ऐसा सुख मिल रहा था जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था, उसने कविता के बालों को पकड़कर अपनी लय तेज कर दी।
अब समय था कि रोहन कविता की गहराई को मापे। उसने कविता को बिस्तर पर लिटाया और उसकी साड़ी और पेटीकोट पूरी तरह उतार दिए। कविता अब पूरी तरह निर्वस्त्र थी, उसके जिस्म का हर हिस्सा रोहन को दावत दे रहा था। उसके पैरों के बीच की खाई गुलाबी और रसीली दिख रही थी, जहाँ काले-काले रेशमी बाल थे। रोहन ने अपनी उंगली से उस खाई को टटोलना शुरू किया, तो पाया कि वह पहले से ही काफी गीली और गर्म थी। कविता बिस्तर पर तड़पने लगी और उसने रोहन को अपने ऊपर आने का इशारा किया। रोहन ने अपने खीरा को उस खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से अंदर धकेला।
जैसे ही खीरा पहली बार खाई के अंदर गया, कविता के मुँह से एक लंबी आह निकली। वह जगह काफी तंग थी लेकिन रोहन के जोश ने उसे धीरे-धीरे खोल दिया। रोहन ने अब पूरी ताकत से खुदाई शुरू कर दी। हर धक्के के साथ कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और रोहन उन्हें अपने हाथों में भरकर दबा रहा था। कमरे में केवल शरीर के टकराने की आवाजें और कविता की सिसकारियां गूँज रही थीं। रोहन ने कविता की टांगों को अपने कंधों पर रख लिया ताकि वह और गहराई तक खुदाई कर सके। कविता चिल्ला रही थी, “ओह रोहन, और तेज… मुझे और अंदर तक खोदो, बहुत मजा आ रहा है!”
कुछ देर सामने से खुदाई करने के बाद, रोहन ने कविता को पलटने के लिए कहा। अब कविता घुटनों के बल खड़ी थी और उसका भारी पिछवाड़ा रोहन की ओर था। रोहन ने पीछे से अपना खीरा फिर से उसकी खाई में उतारा और इस बार उसकी गति और भी तेज थी। वह एक जंगली जानवर की तरह कविता की देह को जोत रहा था। कविता का पूरा बदन पसीने से लथपथ था और वह अपने हाथों से बिस्तर की चादर को कसकर पकड़े हुए थी। रोहन ने अब अपना हाथ आगे बढ़ाकर कविता के मटरों को मरोड़ना शुरू किया, जिससे उसकी कामुकता सातवें आसमान पर पहुँच गई।
खुदाई अब अपने अंतिम चरण में थी। रोहन और कविता दोनों का शरीर कांप रहा था। रोहन ने महसूस किया कि अब उसका रस छूटने वाला है, और कविता भी अपनी चरम सीमा पर थी। उसने रोहन को कसकर जकड़ लिया और रोहन ने अपने खीरा से तेज धक्के लगाते हुए अपना सारा गर्म रस कविता की खाई की गहराइयों में छोड़ दिया। कविता का शरीर भी एक झटके के साथ ढीला पड़ गया और उसका भी रस निकल गया। दोनों एक-दूसरे की बांहों में सिमट कर बिस्तर पर लेट गए। कविता के चेहरे पर एक असीम संतुष्टि थी और रोहन की आँखों में प्यार। उस रात पाइप तो ठीक हो गया था, लेकिन दो शरीरों के बीच जो प्यास बुझी थी, उसकी गूँज अब हमेशा के लिए उनके दिलों में बस गई थी।