कविता मैम की चु@@ई—>
शहर की उस शांत दोपहर में जब सूरज की किरणें खिड़की के पर्दों से छनकर कमरे के फर्श पर सुनहरी लकीरें बना रही थीं, रोहन अपनी पुरानी ट्यूशन टीचर कविता मैम के घर के बाहर खड़ा था। पाँच साल बीत चुके थे, लेकिन उस घर की खुशबू आज भी वही थी। रोहन अब एक गबरू जवान बन चुका था, जिसकी चौड़ी छाती और मजबूत बाजू उसकी मर्दानगी की गवाही दे रहे थे। कविता मैम ने दरवाजा खोला, तो रोहन की सांसें थम सी गईं। वह पहले से भी ज्यादा हसीन और कयामत लग रही थीं। उन्होंने एक बैंगनी रंग की सूती साड़ी पहनी हुई थी, जिसमें उनके शरीर का हर उभार जैसे किसी कविता की तरह ढल रहा था। उनकी उम्र अब बत्तीस के करीब होगी, लेकिन उनके बदन की कसावट आज भी वैसी ही थी जैसी रोहन के सपनों में आती थी।
कविता मैम की कद-काठी किसी अप्सरा से कम नहीं थी। उनके कंधे थोड़े चौड़े थे और उनकी कमर इतनी पतली थी कि जैसे कोई उसे एक हाथ से थाम ले। साड़ी के ब्लाउज से झांकते उनके भारी और गोल-मटोल तरबूज किसी का भी मन डोलने के लिए काफी थे। जब वह चलती थीं, तो उनके भारी तरबूज हल्के-हल्के हिलते थे, जो रोहन की नजरों को अपनी ओर खींच रहे थे। उनके ब्लाउज के भीतर दबे उन तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर साफ उभर आए थे, शायद कमरे की हल्की ठंडक या रोहन की मौजूदगी के कारण। उनका पिछवाड़ा साड़ी के महीन कपड़े में से बहुत ही आकर्षक और मांसल दिखाई दे रहा था। जब वह मुड़ीं, तो उनके पिछवाड़े की गोलाई देखकर रोहन के मन में एक अजीब सी हलचल मच गई और उसका खीरा अपनी जगह पर फन उठाने लगा।
ड्राइंग रूम में बैठते ही पुरानी यादें ताजा होने लगीं। कविता मैम ने मुस्कुराते हुए रोहन को देखा और कहा, ‘तुम तो बहुत बड़े हो गए हो रोहन, बिल्कुल पहचान में नहीं आ रहे।’ उनकी आवाज में वही पुरानी मिठास थी, लेकिन आज उसमें एक अलग तरह की गहराई और मादकता घुली हुई थी। बातों-बातों में जब वह रोहन के करीब आईं, तो उनके शरीर से आने वाली सोंधी खुशबू ने रोहन को मदहोश कर दिया। रोहन ने देखा कि मैम की गर्दन पर पसीने की कुछ बूंदें चमक रही थीं, जो धीरे-धीरे फिसलकर उनके ब्लाउज की गहराई में खो रही थीं। रोहन का मन किया कि वह उन बूंदों को अपनी जुबान से चख ले। उनके बीच की बातचीत धीरे-धीरे पढ़ाई से हटकर निजी एहसासों पर आने लगी, जहाँ शब्दों से ज्यादा उनकी आँखें बातें कर रही थीं।
रोहन ने हिम्मत जुटाई और अपना हाथ कविता मैम के हाथ पर रख दिया। मैम ने हाथ हटाया नहीं, बल्कि उनकी उंगलियां रोहन की हथेलियों में धीरे से समा गईं। उस पहले स्पर्श ने दोनों के शरीरों में बिजली सी दौड़ा दी। रोहन ने महसूस किया कि मैम की सांसें तेज होने लगी थीं। उसने धीरे से उनका चेहरा अपनी ओर घुमाया। मैम की आँखों में शर्म और चाहत का एक मिला-जुला संघर्ष चल रहा था। रोहन ने धीमी आवाज में कहा, ‘मैम, आप आज भी उतनी ही खूबसूरत हैं कि मेरा मन आपके पास आने से खुद को रोक नहीं पा रहा।’ मैम की पलकें झुक गईं और उन्होंने अपनी निचली होंठ को दांतों तले दबा लिया, जिससे उनकी कामुकता और भी बढ़ गई।
झिझक की दीवार तब पूरी तरह टूट गई जब रोहन ने कविता मैम को अपनी बाहों में भर लिया। उनके भारी तरबूज रोहन की मजबूत छाती से पूरी तरह सट गए। मैम के मुँह से एक हल्की सी आह निकली और उन्होंने रोहन के गले में अपनी बाहें डाल दीं। रोहन ने अपनी उंगलियों को मैम की पीठ पर साड़ी के नीचे सरकाया, जिससे मैम का पूरा बदन कांप उठा। रोहन ने उनके गर्दन के पीछे वाले हिस्से को चूमना शुरू किया, जिससे मैम की पकड़ और भी मजबूत हो गई। वह अब पूरी तरह से रोहन के प्यार में डूबने के लिए तैयार थीं। रोहन ने देखा कि मैम की आँखों में अब सिर्फ प्यास थी, एक ऐसी प्यास जिसे बुझाने का वक्त अब आ चुका था।
धीरे-धीरे रोहन ने मैम की साड़ी के पल्लू को उनके कंधे से नीचे गिरा दिया। अब उनके सामने मैम के वे लजीज तरबूज सिर्फ एक पतले ब्लाउज की कैद में थे। रोहन ने ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले, और जैसे ही ब्लाउज खुला, दो विशाल और गोरे तरबूज बाहर छलक आए। उन पर लगे छोटे-छोटे मटर उत्तेजना के कारण पूरी तरह सख्त हो चुके थे। रोहन ने अपनी जुबान से उन मटरों को सहलाना शुरू किया, तो मैम ने अपना सिर पीछे की ओर झुका लिया और उनके मुँह से सिसकारियां निकलने लगीं। रोहन बारी-बारी से दोनों तरबूजों को अपने मुँह में भरकर उनका रस महसूस करने लगा, जबकि मैम की उंगलियां रोहन के बालों में उलझ गई थीं।
रोहन ने अब मैम की साड़ी और पेटीकोट को पूरी तरह से नीचे गिरा दिया। अब वह बिना किसी पर्दे के रोहन के सामने खड़ी थीं। उनके शरीर के निचले हिस्से में बालों का एक छोटा सा जंगल था, जिसके नीचे उनकी गहरी और रसीली खाई छिपी हुई थी। रोहन ने अपनी उंगलियों को उस खाई के पास ले जाकर सहलाया, तो पाया कि वह खाई पहले से ही पूरी तरह गीली और चिपचिपी हो चुकी थी। मैम ने रोहन की पैंट की जिप खोली और उसके तने हुए मजबूत खीरे को बाहर निकाला। खीरे की लंबाई और मोटाई देखकर मैम की आँखें फैल गईं। उन्होंने अपने कोमल हाथों से उस खीरे को थामा और उसे सहलाने लगीं, जिससे रोहन के बदन में सिहरन दौड़ गई।
अब बारी थी उस रसीली खाई को चखने की। रोहन ने मैम को बिस्तर पर लेटाया और उनके पैरों को फैलाकर उनकी खाई के बीच अपना चेहरा ले गया। जैसे ही उसने अपनी जुबान से उस खाई को चाटना शुरू किया, मैम बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींचने लगीं। वह अपनी कमर को ऊपर-नीचे कर रही थीं ताकि रोहन उनकी खाई के हर कोने को अच्छी तरह साफ कर सके। रोहन की जुबान का स्पर्श मैम को पागल कर रहा था। वह कहने लगीं, ‘ओह रोहन, बस करो… अब मुझे अपने उस बड़े खीरे का स्वाद चखना है, मैं और बर्दाश्त नहीं कर पा रही।’ रोहन ने उनकी बात मानी और अपना खीरा मैम के मुँह के पास ले गया, जिसे उन्होंने तुरंत अपने अंदर भर लिया और उसे चूसने लगीं।
जब दोनों की उत्तेजना चरम पर पहुँच गई, तो रोहन ने खुदाई शुरू करने का फैसला किया। उसने मैम को बिस्तर के किनारे पर बिठाया और उनके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। उसने अपने खीरे की टोपी को मैम की गीली खाई के द्वार पर रखा और एक जोरदार धक्का दिया। खीरा आधा उनकी खाई के अंदर समा गया। मैम के मुँह से एक चीख निकली, ‘आह्ह्ह रोहन… तुम तो बहुत बड़े हो… मर जाऊंगी मैं!’ लेकिन रोहन नहीं रुका, उसने एक और गहरा धक्का दिया और इस बार पूरा खीरा उनकी खाई की गहराई तक जा पहुँचा। कुछ पलों के लिए दोनों स्थिर हो गए, बस एक-दूसरे की धड़कनें और तेज सांसें सुनाई दे रही थीं।
धीरे-धीरे रोहन ने खुदाई की गति बढ़ानी शुरू की। कमरे में थप-थप की आवाजें गूँजने लगीं। रोहन हर बार पूरे जोर से अपना खीरा उनकी खाई में उतारता और फिर उसे बाहर निकालता। मैम हर धक्के के साथ चिल्ला उठती थीं, ‘हाँ रोहन… और जोर से खोदो… मुझे पूरी तरह से अपना बना लो!’ रोहन ने उन्हें बीच-बीच में चूमना जारी रखा ताकि उनका दर्द कम हो और मजा बढ़ जाए। वह उनके भारी तरबूजों को अपने हाथों से मसल रहा था, जिससे खुदाई का आनंद और भी दोगुना हो गया था। मैम की खाई के भीतर से निकलता हुआ पानी अब रोहन के खीरे पर लगकर उसे और भी चिकना बना चुका था।
खुदाई के बीच में रोहन ने मैम की स्थिति बदली और उन्हें बिस्तर पर हाथों और घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब उनका भारी पिछवाड़ा रोहन के ठीक सामने था। रोहन ने पीछे से उनके पिछवाड़े को पकड़ा और अपने खीरे को फिर से उनकी खाई में पीछे के रास्ते से दाखिल कर दिया। पिछवाड़े से खुदाई का यह तरीका मैम को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रहा था। वह अपने कूल्हों को पीछे की ओर धकेल रही थीं ताकि रोहन का खीरा और गहराई तक जा सके। रोहन ने उनके बालों को पीछे से पकड़ा और तेज गति से धक्के मारने लगा। ‘तुम बहुत अच्छी खुदाई कर रहे हो रोहन… ओह मेरी जान… मुझे बहुत मजा आ रहा है!’ मैम की आवाज पूरी तरह लड़खड़ा रही थी।
लगभग आधे घंटे की लगातार खुदाई के बाद रोहन को महसूस हुआ कि उसका रस अब छूटने वाला है। मैम भी अपनी चरमानंद की स्थिति के बहुत करीब थीं। उनकी खाई की पकड़ अब खीरे पर बहुत ज्यादा मजबूत हो गई थी। रोहन ने अपनी गति को अपनी आखिरी सीमा तक बढ़ा दिया। मैम ने जोर से चिल्लाते हुए रोहन को अपनी ओर खींचा और तभी दोनों का रस एक साथ छूटने लगा। मैम की खाई से निकलने वाला गरम रस और रोहन के खीरे से निकलता हुआ गाढ़ा सफेद रस एक-दूसरे में मिल गए। दोनों एक-दूसरे पर गिर पड़े, पसीने से लथपथ और पूरी तरह से संतुष्ट। उनकी सांसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं, लेकिन वह अहसास अब भी उनके शरीरों में मौजूद था।
खुदाई खत्म होने के बाद रोहन वहीं मैम के बगल में लेट गया और उन्हें अपनी बाहों में समेट लिया। मैम का चेहरा शर्म से लाल था, लेकिन उनकी आँखों में एक गहरी संतुष्टि और प्यार झलक रहा था। उन्होंने रोहन के सीने पर अपना सिर रखा और कहा, ‘मैने कभी नहीं सोचा था कि मेरा छोटा सा रोहन इतना बड़ा खिलाड़ी निकलेगा।’ रोहन ने उनके माथे को चूमा और उन्हें और भी कसकर पकड़ लिया। कमरे की शांति अब और भी सुकून भरी लग रही थी। दोनों जानते थे कि यह सिर्फ एक बार की बात नहीं थी, बल्कि एक नए और गहरे रिश्ते की शुरुआत थी जो शब्दों से परे और जिस्मानी हदों से कहीं ज्यादा ऊपर था।
उस दिन के बाद से कविता मैम और रोहन के बीच की दूरियाँ हमेशा के लिए खत्म हो गईं। वह अब सिर्फ एक छात्र और टीचर नहीं थे, बल्कि दो ऐसे प्रेमी बन चुके थे जिन्होंने एक-दूसरे की रूह और जिस्म को पूरी तरह से जान लिया था। जब भी रोहन को मौका मिलता, वह मैम के घर पहुँच जाता और दोनों घंटों तक खुदाई के उस खेल का आनंद लेते जो उन्हें दुनिया की सारी खुशियाँ दे देता था। कविता मैम का वह भारी शरीर और रोहन का वह मजबूत खीरा अब एक-दूसरे के पूरक बन चुके थे, जो हर बार एक नई कहानी लिखने के लिए तैयार रहते थे।