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पड़ोसन शोभा की चु@@ई

पड़ोसन शोभा की चु@@ई—>नया शहर और नया अपार्टमेंट, समीर के लिए सब कुछ एक ताज़गी भरा अहसास लेकर आया था। समीर एक फ्रीलांस फोटोग्राफर था, जिसकी आँखों में हमेशा दृश्यों को गहराई से देखने की आदत थी। उसका फ्लैट नंबर 402 था और ठीक उसके सामने वाले फ्लैट 401 में शोभा जी रहती थीं। शोभा की उम्र लगभग पैंतीस के आसपास रही होगी, लेकिन उनके शरीर की बनावट और चेहरे की चमक किसी बीस साल की युवती को मात देने वाली थी। उनकी चाल में एक खास किस्म का ठहराव था और उनकी आँखों में एक अनकही प्यास, जिसे समीर अपनी पहली ही मुलाकात में ताड़ गया था। शोभा एक गृहणी थीं जिनके पति अक्सर व्यापार के सिलसिले में शहर से बाहर रहा करते थे, जिससे उनके जीवन में एक गहरा सूनापन और शारीरिक एकांत घर कर गया था।

शोभा जी के शरीर का आकार बेहद मादक और भरा हुआ था, जिसे देखकर किसी भी पुरुष का मन डोल जाए। जब भी वह बालकनी में आतीं, उनके रेशमी साड़ी के पल्लू से झांकते हुए उनके बड़े-बड़े तरबूज समीर की धड़कनें बढ़ा देते थे। उन तरबूजों की गोलाई इतनी सटीक थी कि समीर अक्सर घंटों उन्हें निहारने के बहाने ढूंढता रहता था। उनकी कमर पतली थी लेकिन उनके नीचे का हिस्सा, उनका पिछवाड़ा, काफी चौड़ा और मांसल था, जो साड़ी में साफ़ उभर कर दिखता था। समीर अक्सर सोचता कि उन तरबूजों के बीच जो मटर के दाने होंगे, वे कितने संवेदनशील और कोमल होंगे। शोभा की त्वचा का रंग गेंहुआ था लेकिन उसमें एक अलग ही चिकनाहट थी जो सूरज की रोशनी में और भी ज्यादा चमक उठती थी।

एक दोपहर जब पूरा अपार्टमेंट सन्नाटे में डूबा हुआ था, अचानक शोभा समीर के दरवाजे पर आईं। उनके चेहरे पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें थीं और उन्होंने एक पतली नाइटी पहन रखी थी, जिसके अंदर से उनके तरबूज साफ हिलते हुए दिखाई दे रहे थे। उन्होंने बताया कि उनके किचन का सिंक जाम हो गया है और प्लम्बर फोन नहीं उठा रहा। समीर ने बिना देर किए उनकी मदद का प्रस्ताव दिया। जैसे ही वह उनके फ्लैट में दाखिल हुआ, उसे शोभा के शरीर से आती एक भीनी-भीनी खुशबू ने मदहोश कर दिया। किचन में काम करते वक्त समीर का हाथ गलती से शोभा के कूल्हों से छू गया, जिससे दोनों के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। शोभा ने तुरंत अपनी नजरें झुका लीं, लेकिन उनकी बढ़ती हुई साँसों ने समीर को इशारा दे दिया था कि उनके मन में भी आग सुलग रही है।

समीर ने सिंक ठीक कर दिया था, लेकिन अब वातावरण में एक अजीब सी उत्तेजना और तनाव था। शोभा ने उसे चाय के लिए रुकने को कहा, और समीर मना नहीं कर पाया। हॉल में सोफे पर बैठते हुए समीर ने गौर किया कि शोभा जानबूझकर उसके करीब बैठ रही थीं। उनकी नाइटी का गला काफी गहरा था, जिससे उनके तरबूजों की गहरी घाटी समीर को साफ़ नजर आ रही थी। समीर ने धीरे से अपना हाथ शोभा के हाथ पर रखा। शोभा ने हाथ हटाया नहीं, बल्कि मजबूती से समीर की उंगलियों को पकड़ लिया। उनकी आँखों में अब झिझक की जगह एक गहरी प्यास थी। समीर ने उनके करीब जाकर उनके चेहरे को अपने हाथों में लिया और उनके गुलाबी अधरों का रस चखना शुरू किया। वह पल उनके बीच के सारे बांधों को तोड़ देने वाला था।

समीर ने धीरे से शोभा की नाइटी के स्ट्रैप्स कंधे से नीचे गिराए। जैसे ही नाइटी नीचे गिरी, शोभा के विशाल और गोरे तरबूज समीर की आँखों के सामने आ गए। उनके ऊपर लगे भूरे रंग के मटर के दाने ठंड और उत्तेजना से पूरी तरह सख्त हो चुके थे। समीर ने झुककर उन मटरों को अपने मुँह में लिया और धीरे-धीरे उन्हें सहलाने लगा। शोभा के मुँह से दबी-कुचली आहें निकलने लगीं और वह समीर के बालों को अपनी उंगलियों में भींचने लगीं। समीर ने अपने हाथ नीचे ले जाते हुए शोभा की रेशमी खाई को महसूस किया। वहाँ पहले से ही रस की नदियाँ बह रही थीं, जो यह बता रही थीं कि शोभा कितनी ज्यादा तैयार हैं। समीर ने अपनी उंगली से खाई को खोदना शुरू किया, जिससे शोभा के शरीर में एक तड़प सी पैदा हो गई।

अब समीर ने अपने कपड़े उतार फेंके और उसका विशाल खीरा गर्व से खड़ा होकर अपनी बारी का इंतजार करने लगा। शोभा की नजरें जब समीर के उस कड़क और लम्बे खीरे पर पड़ीं, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने झुककर उस खीरे को अपने हाथों में लिया और उसे किसी कीमती फल की तरह चूमने लगीं। फिर शोभा ने उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे बड़ी ही शिद्दत से चूसने लगीं। समीर को लगा जैसे उसका रस अभी निकल जाएगा, लेकिन उसने खुद पर काबू पाया। उसने शोभा को सोफे पर लिटाया और उनके पैरों को फैलाकर उनकी खाई के द्वार पर अपना खीरा टिका दिया। शोभा ने समीर को अपनी ओर खींचते हुए कहा, ‘समीर, अब और इंतजार मत कराओ, मुझे पूरी तरह से खोद डालो।’

समीर ने एक जोरदार धक्का दिया और उसका खीरा आधा शोभा की गहराई में समा गया। शोभा की चीख समीर के मुँह के अंदर ही दब गई क्योंकि समीर ने उन्हें चूमना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे समीर ने सामने से खोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ शोभा के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके शरीर से पसीना बहकर बिस्तर को गीला कर रहा था। समीर ने अपनी गति बढ़ाई और अब वह पूरी ताकत से शोभा को खोद रहा था। कमरा उनके जिस्मों के टकराने की आवाजों और शोभा की सुरीली कराहों से गूंज रहा था। शोभा बार-बार कह रही थीं, ‘हाँ समीर, वैसे ही, और अंदर तक खोदो, मेरा पिछवाड़ा भी आज तुम्हारी इस खुदाई का गवाह बनेगा।’ समीर ने उन्हें घुमाया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, जिससे शोभा को चरम सुख का अहसास होने लगा।

खुदाई की यह प्रक्रिया काफी लंबी चली। समीर का खीरा बार-बार शोभा की खाई की दीवारों से टकराकर उन्हें पागल बना रहा था। अंत में, समीर ने अपनी गति को चरम पर पहुँचाया और शोभा ने उसे अपने सीने से जोर से चिपका लिया। कुछ ही पलों में समीर का सारा गर्म रस शोभा की खाई के अंदर छूट गया और ठीक उसी समय शोभा का भी अपना रस निकल गया। दोनों निढाल होकर एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े। शोभा की साँसे अभी भी उखड़ी हुई थीं और उनके शरीर पर पसीने की चादर लिपटी हुई थी। समीर ने उनके माथे को चूमा और उन्हें अपनी बाहों में भर लिया। उस शाम की वह खुदाई सिर्फ शारीरिक जरूरत नहीं थी, बल्कि दो अकेले रूहों का एक-दूसरे में मिलन था। शोभा के चेहरे पर अब एक अजीब सा संतोष था, जैसे बरसों की प्यास बुझ गई हो।

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