Join WhatsApp Click Here
Join Telegram Click Here

साली की नशीली चु@@ई


साली की नशीली चु@@ई—>

दोपहर की चिलचिलाती गर्मी में घर के भीतर एक अजीब सी खामोशी छाई हुई थी, जो किसी आने वाले तूफान का संकेत दे रही थी। समीर अपने कमरे में मेज पर झुककर लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था, लेकिन उसका मन बार-बार भटक रहा था क्योंकि घर में उसके और उसकी साली कविता के अलावा और कोई नहीं था। कविता अभी कॉलेज से आई थी और गर्मी की वजह से उसने अपना दुपट्टा एक तरफ रख दिया था, जिससे उसकी देह की बनावट साफ नजर आ रही थी। समीर ने खिड़की से देखा कि कविता रसोई में पानी पी रही है और उसके बदन से निकलता पसीना उसके कुर्ते को जगह-जगह से शरीर पर चिपका रहा था। समीर के मन में एक अजीब सी हलचल मचने लगी थी जिसे वह चाहकर भी दबा नहीं पा रहा था, उसकी धड़कनें तेज हो गई थीं और सांसों में एक भारीपन आ गया था।

कविता कमरे के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई, उसने एक बेहद झीना और पतला गुलाबी रंग का सूट पहना हुआ था जो उसके यौवन को पूरी तरह से ढकने में नाकाम था। उसके सीने पर उभरे हुए दोनों रसीले तरबूज मानो बाहर आने को बेताब थे और उन तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे दाने जैसे मटर साफ दिखाई दे रहे थे जो कपड़े को भेदकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे। उसकी पतली कमर और भारी पिछवाड़ा उसे किसी अप्सरा की तरह आकर्षक बना रहे थे, और जब वह चलती थी तो उसके शरीर का हर अंग एक लय में थिरकता था। समीर उसे बस देखता ही रह गया, उसकी आंखों में कामुकता और प्रशंसा का एक मिला-जुला भाव था, जिसे देखकर कविता की पलकें शर्म से झुक गईं। वह जानती थी कि समीर उसे किस नजर से देख रहा है, फिर भी उसने वहां से हटने की कोशिश नहीं की बल्कि धीरे-धीरे समीर के करीब आने लगी।

दोनों के बीच एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव हमेशा से था, कविता अक्सर अपनी निजी बातें और परेशानियां समीर के साथ साझा करती थी क्योंकि समीर उसे बहुत अच्छी तरह समझता था। आज जब वह उसके पास बैठी, तो उसकी आंखों में एक अजीब सी नमी थी, जैसे वह किसी बात को लेकर बहुत भावुक हो। समीर ने धीरे से उसका हाथ अपने हाथ में लिया और उसकी उंगलियों को सहलाते हुए पूछा कि क्या बात है, तो कविता की आंखों से आंसू छलक पड़े और वह उसके सीने से लग गई। समीर ने उसे सांत्वना देने के लिए अपनी बाहों में भर लिया, लेकिन जैसे ही उसके शरीर का स्पर्श समीर के सीने से हुआ, दोनों के बीच एक बिजली सी दौड़ गई। कविता के कोमल तरबूज समीर की छाती पर दब रहे थे, जिससे उन दोनों के बीच की झिझक धीरे-धीरे कम होने लगी और एक नई तरह की प्यास जागने लगी।

समीर ने अपना हाथ धीरे से कविता की कमर पर रखा और उसे अपनी ओर और जोर से खींच लिया, जिससे कविता की सांसें तेज चलने लगीं और उसके गले से एक हल्की सी कराह निकली। उसने कविता के चेहरे को ऊपर उठाया और उसकी आंखों में गहराई से झांका, जहां उसे अपने लिए अथाह प्यार और दबी हुई इच्छाएं दिखाई दीं। समीर ने धीरे-धीरे अपने होंठ कविता के होंठों की ओर बढ़ाए और जैसे ही उनके होंठ आपस में मिले, पूरी दुनिया मानो रुक सी गई। वह एक बहुत ही कोमल और रसभरा पल था, समीर उसके होंठों का रस ऐसे पी रहा था जैसे कोई प्यासा सदियों बाद पानी पी रहा हो। कविता ने भी अपनी आंखें बंद कर लीं और समीर के बालों में अपनी उंगलियां फंसा दीं, वह इस एहसास में पूरी तरह खो चुकी थी और उसकी शर्म अब धीरे-धीरे कम हो रही थी।

चुंबन के उस लंबे दौर के बाद, समीर के हाथ अब बेकाबू हो रहे थे और वह धीरे-धीरे कविता के सूट के बटनों को खोलने लगा, जिससे उसका गोरा बदन धीरे-धीरे उजागर होने लगा। जैसे ही सूट नीचे गिरा, समीर के सामने दो विशाल और गोल-मटोल तरबूज थे, जिनके बीच की दरार बहुत ही गहरी और आकर्षक लग रही थी। उन तरबूजों के ऊपर के मटर अब पूरी तरह से तन चुके थे और समीर ने झुककर उन मटरों को अपने मुंह में भर लिया, जिससे कविता के मुंह से एक तीखी आह निकली। वह समीर के सिर को अपने सीने पर दबाने लगी और उसके हाथ समीर की पीठ पर पसीने से लथपथ होकर रेंग रहे थे। समीर की उंगलियां अब कविता की जांघों के बीच की गहरी खाई की ओर बढ़ने लगीं, जहां उसने महसूस किया कि वह खाई पहले से ही बहुत गीली और गर्म हो चुकी थी।

समीर ने धीरे से कविता के निचले कपड़े भी उतार दिए और अब वह पूरी तरह से प्राकृतिक अवस्था में उसके सामने थी, उसकी देह की चमक समीर की आंखों को चौंधिया रही थी। उसने कविता की जांघों को थोड़ा फैलाया और वहां के काले रेशमी बालों के बीच छिपी हुई उस गुलाबी खाई को निहारने लगा जो किसी स्वर्ग के द्वार जैसी लग रही थी। समीर ने अपनी जीभ से उस खाई को चखना शुरू किया, तो कविता के शरीर में एक जोर का झटका लगा और वह बिस्तर की चादर को कसकर पकड़ने लगी। वह बार-बार ‘ओह समीर, तुम बहुत अच्छा कर रहे हो’ कह रही थी और उसकी आवाज में एक अजीब सा नशा था जो समीर को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रहा था। समीर ने अपनी उंगली से खाई के अंदर की गहराई को मापना शुरू किया, जिससे कविता का पूरा शरीर थरथराने लगा और वह बेतहाशा सिसकियां लेने लगी।

अब समीर ने अपनी पैंट उतारी और उसका विशाल और सख्त खीरा पूरी तरह से बाहर आ गया, जो अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ कविता की खाई में जाने को तैयार था। कविता ने जब उस विशाल खीरे को देखा तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई, लेकिन अगले ही पल उसने उस खीरे को अपने नाजुक हाथों में पकड़ लिया और उसे चूमने लगी। वह बड़े प्यार से खीरे के ऊपरी हिस्से को अपने मुंह में लेकर चूस रही थी, जिससे समीर की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा और वह मजे के चरम पर पहुंचने लगा। कविता ने कुछ देर तक खीरा चूसने के बाद समीर को अपने ऊपर आने का इशारा किया और अपनी टांगें पूरी तरह से फैला दीं। समीर ने खीरे की नोक को उस गीली खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से एक दबाव बनाया, जिससे कविता की आंखों से दर्द और मजे के मिले-जुले आंसू निकल आए।

समीर ने एक गहरा धक्का दिया और पूरा खीरा कविता की तंग खाई के अंदर समा गया, जिससे एक सुरीली आवाज निकली और कविता ने समीर को कसकर गले लगा लिया। वह सामने से खुदाई करने लगा, हर धक्के के साथ उसका खीरा कविता की खाई की गहराई को छू रहा था और कविता के रसीले तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। समीर ने उसके तरबूजों को अपने हाथों में जोर-जोर से मसलना शुरू किया, जिससे कविता की उत्तेजना सातवें आसमान पर पहुंच गई और वह पागलों की तरह समीर के नीचे तड़पने लगी। दोनों के शरीरों से पसीना बह रहा था और कमरे में सिर्फ उनके जिस्मों के टकराने की आवाज और उनकी भारी सांसें सुनाई दे रही थीं। समीर अब अपनी रफ्तार बढ़ाने लगा था, वह अब पूरी ताकत के साथ खुदाई कर रहा था और कविता उसके हर धक्के का जवाब अपनी कमर उठाकर दे रही थी।

खुदाई की प्रक्रिया अब बहुत ही रोमांचक मोड़ पर थी, समीर ने कविता को घुमाया और उसे बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब वह उसके पिछवाड़े से खुदाई करने की तैयारी में था, कविता का भारी पिछवाड़ा समीर के सामने था और उसकी खाई पीछे से साफ नजर आ रही थी। समीर ने फिर से अपना खीरा उस खाई में उतारा और पीछे से जोर-जोर से धक्के मारने लगा, जिससे कविता का पूरा शरीर आगे-पीछे डोल रहा था। वह जोर-जोर से चिल्ला रही थी, ‘समीर, मुझे और खोदो, आज मुझे पूरी तरह से अपना बना लो, मुझे बहुत मजा आ रहा है।’ समीर भी जोश में था, उसकी सांसें फूल रही थीं लेकिन उसका खीरा अभी भी पूरी तरह से पत्थर जैसा सख्त था। उसने कविता के बालों को पकड़कर पीछे खींचा और उसके गले पर अपनी जीभ फेरते हुए उसे चरम सुख की ओर ले जाने लगा।

काफी देर तक चली उस भीषण और आनंददायक खुदाई के बाद, समीर को महसूस हुआ कि अब उसका रस निकलने वाला है, उसका पूरा शरीर अकड़ने लगा था। उसने आखिरी के कुछ बहुत ही शक्तिशाली धक्के मारे और अपना सारा रस कविता की गहरी खाई के अंदर ही छोड़ दिया, जिससे कविता का शरीर भी एक बार जोर से कांपा और उसका भी रस छूट गया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, उनकी सांसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं और उनके शरीर पसीने से भीगे हुए थे। उस खुदाई के बाद कविता के चेहरे पर एक अजीब सी शांति और संतुष्टि थी, उसने समीर का माथा चूमा और उसे अपनी बाहों में समेट लिया। वह पल सिर्फ शारीरिक सुख का नहीं था, बल्कि दो रूहों के मिलन का था जिसने उनके रिश्ते को एक नई गहराई और मजबूती प्रदान की थी, और वे दोनों देर तक उसी अवस्था में लेटे रहे।

Leave a Comment

You cannot copy content of this page

error: Content is protected !!