पसीने की महक और प्रेस वाले की गहरी खुदाई—>
दोपहर की चिलचिलाती धूप में मीरा अपने घर के ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठी टीवी देख रही थी, लेकिन उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था। उसके पति ऑफिस के काम से दो दिनों के लिए शहर से बाहर गए थे और घर में वह बिल्कुल अकेली थी। मीरा की उम्र 28 साल थी और उसका शरीर किसी तराशे हुए पत्थर की तरह सुडौल था, जिसमें उसके भरे हुए तरबूज उसकी पतली रेशमी साड़ी के नीचे से साफ झलक रहे थे। तभी दरवाजे की घंटी बजी और उसने दरवाजा खोला तो सामने राजू खड़ा था, जो पास की ही दुकान में कपड़ों पर स्त्री करने का काम करता था।
राजू की उम्र करीब 24 साल रही होगी और रोज भारी प्रेस चलाने की वजह से उसके हाथ और कंधे काफी मजबूत और गठे हुए थे। उसकी बनियान पसीने से भीगकर उसके बदन से चिपक गई थी, जिससे उसके शरीर की बनावट साफ दिख रही थी। मीरा ने उसे अंदर आने का इशारा किया और कपड़ों का बंडल लेने के लिए मुड़ी, तभी उसे महसूस हुआ कि राजू की नजरें उसके पीछे के भारी पिछवाड़े पर टिकी हुई थीं। मीरा को एक अजीब सी सिहरन महसूस हुई, उसने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा और कस लिया, लेकिन उसके मटर जैसे उभार साड़ी के महीन कपड़े को चीरकर बाहर आने को बेताब थे।
मीरा ने कपड़े गिनते हुए राजू की तरफ देखा तो पाया कि राजू की नजरें सीधे उसकी गहरी खाई पर जमी हुई थीं जो झुकने की वजह से साड़ी के गले से साफ दिख रही थी। कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया था और दोनों के बीच एक अनकहा तनाव पैदा हो गया था। राजू की सांसें तेज चलने लगी थीं और उसके पाजामे के नीचे उसका लंबा और सख्त खीरा अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहा था। मीरा ने नजरें चुराने की कोशिश की लेकिन उसका मन भी इस अनजाने आकर्षण की ओर खिंचा चला जा रहा था, उसे अपनी खाई में एक गीलापन महसूस होने लगा था।
राजू ने हिम्मत जुटाकर मीरा का हाथ पकड़ लिया जब वह उसे पैसे दे रही थी, स्पर्श इतना बिजली जैसा था कि मीरा के पूरे शरीर में कंपन दौड़ गया। राजू ने दबी आवाज में कहा, ‘मैम साहब, आज आप बहुत प्यासी लग रही हैं, क्या मैं आपकी इस प्यास को बुझा सकता हूँ?’ मीरा ने पहले तो मना करने की कोशिश की लेकिन उसकी आंखों की हवस और खुद की दबी हुई इच्छाओं ने उसे रोक दिया। उसने राजू को अपने बेडरूम की तरफ इशारा किया, जहाँ अब एक लंबी और गहरी खुदाई का खेल शुरू होने वाला था।
बेडरूम में पहुँचते ही राजू ने मीरा को बाहों में भर लिया और उसके होंठों को पागलों की तरह चूमने लगा, जबकि उसके हाथ मीरा के भारी और रसीले तरबूजों को मसलने लगे थे। मीरा की आहें निकलने लगीं और उसने राजू की बनियान उतार दी, जिससे उसका पसीने से तरबतर बदन सामने आ गया। राजू ने धीरे से मीरा की साड़ी उतार दी और अब वह सिर्फ अपने पेटीकोट और ब्लाउज में थी। राजू ने बिना देर किए उसके ब्लाउज के हुक खोल दिए और उसके गोरे-चिट्टे तरबूज उछलकर बाहर आ गए, जिनके ऊपर लगे गुलाबी मटर ठंड और उत्तेजना से पूरी तरह सख्त हो चुके थे।
राजू ने अपने मुंह में एक मटर को लिया और उसे अपनी जीभ से सहलाने लगा, जिससे मीरा बिस्तर पर तड़पने लगी और उसके हाथ राजू के बालों में फंस गए। मीरा ने राजू के पाजामे की डोरी खींची और जैसे ही उसका सख्त और फन उठाता हुआ खीरा बाहर आया, मीरा की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह खीरा काफी लंबा और मोटा था, जो अब मीरा की खाई में उतरने के लिए बेताब था। मीरा ने झुककर उस खीरे को अपने मुंह में भर लिया और उसे बड़ी शिद्दत से चूसने लगी, जिससे राजू के मुंह से बेसाख्ता कराहें निकलने लगीं और वह मीरा के सिर को सहलाने लगा।
अब राजू ने मीरा को बिस्तर पर लिटाया और उसकी टांगों को फैलाकर उसकी रेशमी खाई का मुआयना करने लगा, जो पूरी तरह से रस से भीग चुकी थी। उसने अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया, जिससे मीरा की कमर ऊपर उठने लगी और वह बार-बार राजू का नाम पुकारने लगी। राजू ने अब अपने खीरे की नोक को खाई के दरवाजे पर रखा और एक जोरदार धक्का दिया, जिससे मीरा के मुंह से एक लंबी चीख निकल गई। सामना से खुदाई इतनी जबरदस्त थी कि पूरा बेड हिलने लगा था और मीरा के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे।
राजू ने अपनी रफ्तार बढ़ा दी और वह तेजी से खोदने लगा, हर धक्के के साथ उसका खीरा मीरा की गहराई को छू रहा था। मीरा ने अपने पैर राजू की कमर के चारों ओर लपेट लिए और उसे अपनी ओर और जोर से खींचने लगी। राजू ने कहा, ‘मैम साहब, आपकी खाई बहुत तंग है, इसे खोदने में बहुत मजा आ रहा है।’ मीरा ने जवाब दिया, ‘और जोर से राजू, मुझे आज पूरी तरह से भर दो, कोई कसर मत छोड़ो।’ कमरे में सिर्फ उनके शरीर के टकराने की और मीरा की सिसकियों की आवाजें गूँज रही थीं।
कुछ देर बाद राजू ने मीरा को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने के लिए तैयार किया, मीरा अब घुटनों के बल थी और उसका पिछवाड़ा हवा में उभरा हुआ था। राजू ने पीछे से अपने खीरे को फिर से उसकी खाई में उतारा और इस बार खुदाई और भी गहरी और दमदार थी। मीरा की आँखें बंद थीं और वह बस उस आनंद के सागर में गोते लगा रही थी। राजू के धक्के अब और भी हिंसक हो गए थे और जल्द ही दोनों अपने चरम पर पहुँचने वाले थे, मीरा का शरीर कांपने लगा था और उसकी खाई से भारी मात्रा में रस निकलने लगा था।
अंत में, राजू ने एक आखिरी जोरदार धक्का दिया और अपना सारा गर्म रस मीरा की गहराई में छोड़ दिया, जिससे दोनों निढाल होकर एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े। मीरा का पूरा शरीर पसीने से नहाया हुआ था और उसकी सांसें अभी भी तेज चल रही थीं। उसने राजू को कसकर गले लगा लिया और उसे अपने पास ही लेटे रहने को कहा। उस दिन की उस गहरी खुदाई ने मीरा के मन और शरीर की सारी थकान मिटा दी थी, वह आज पहली बार एक अजनबी के साथ अपनी भावनाओं और शरीर के उस तालमेल को महसूस कर रही थी जिसे वह बरसों से तलाश रही थी।