ट्यूशन वाली मैम और पुराने छात्र की बगीचे वाली यादें—>कई सालों बाद जब मैं अपने पुराने शहर लौटा तो मन में बस एक ही चेहरा था, मेरी पुरानी ट्यूशन टीचर नीलम मैम। नीलम मैम का वह गहरा व्यक्तित्व और उनकी गंभीर आवाज आज भी मेरे कानों में गूंजती थी। शाम का वक्त था और शहर के किनारे बने उस पुराने सुनसान बगीचे में हम दोनों एक दूसरे के सामने खड़े थे। वक्त ने उनकी खूबसूरती को और भी ज्यादा निखार दिया था, उनके चेहरे पर एक परिपक्वता थी जो उन्हें और भी ज्यादा कामुक बना रही थी। हम दोनों के बीच पुरानी यादों का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन उन यादों के पीछे एक अनकही प्यास छिपी हुई थी जो सालों पहले अधूरी रह गई थी।
नीलम मैम ने उस दिन एक गहरी नीली साड़ी पहनी हुई थी जिसमें उनके शरीर की हर गोलाई साफ़ झलक रही थी। उनके ब्लाउज के भीतर दबे उनके दो बड़े और रसीले तरबूज जैसे बाहर आने को बेताब थे। साड़ी के पल्लू से जब भी वह अपने पसीने को पोंछतीं, तो उनके तरबूज की गहरी लकीर मेरी आँखों के सामने एक नशा सा पैदा कर देती थी। उनकी कमर का घेरा और उनके मांसल अंगों की बनावट देखकर मेरा मन विचलित होने लगा था, वह अब पहले से कहीं ज्यादा आकर्षक और भरी-भरी लग रही थीं। उनकी आँखों में भी एक अजीब सी चमक थी, जैसे वह भी उस पुराने दौर की दबी हुई इच्छाओं को फिर से जगाना चाहती हों।
बातों-बातों में हम बगीचे के एक घने कोने में पहुँच गए जहाँ पुराने बरगद के पेड़ों ने एक कुदरती चादर तान रखी थी। वहाँ का सन्नाटा और नीलम मैम की साँसों की खुशबू ने माहौल को बेहद गर्म बना दिया था। मैंने महसूस किया कि उनके शरीर से एक मदहोश कर देने वाली महक आ रही थी। हमारी बातें अब धीमी होने लगी थीं और हमारी आँखों का संपर्क गहरा होता जा रहा था। मेरे मन में एक अजीब सा द्वंद्व चल रहा था, एक तरफ उनका सम्मान था और दूसरी तरफ उन्हें बाहों में भरने की तीव्र इच्छा। तभी नीलम मैम ने मेरी आँखों में झाँकते हुए कहा, ‘तुम बहुत बदल गए हो समीर, अब तुम वो छोटे लड़के नहीं रहे।’
उनकी इस बात ने जैसे मुझे हरी झंडी दे दी। मैंने धीरे से अपना हाथ उनकी मखमली कमर पर रखा। स्पर्श होते ही उनके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई और उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, लेकिन उनका शरीर मेरे करीब खिंचा चला आ रहा था। मैंने झुककर उनके माथे को चूमा और फिर धीरे-धीरे उनके होंठों के करीब पहुँचा। हमारा पहला चूंबन बहुत ही कोमल और भावनाओं से भरा था। उनकी साँसें तेज हो गई थीं और मेरे हाथ उनकी पीठ पर रेंगते हुए उनके तरबूजों की तरफ बढ़ने लगे थे। उन्होंने एक गहरी आह भरी और मुझे और भी कसकर पकड़ लिया।
धीरे-धीरे उत्तेजना अपने चरम पर पहुँचने लगी। मैंने उनके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले, तो उनके विशाल और गोरे तरबूज आज़ाद होकर बाहर निकल आए। उनके बीच की गहरी घाटी और उनके ऊपर छोटे-छोटे गुलाबी मटर जैसे उभार ठंड और जोश से सख्त हो चुके थे। मैंने अपनी जुबान से उनके मटर को सहलाना शुरू किया, तो वह सिसकने लगीं। ‘ओह समीर… ये क्या कर रहे हो,’ उन्होंने कहा, लेकिन उनके हाथ मुझे अपनी छाती से और भी जोर से चिपका रहे थे। मैं बारी-बारी से उनके दोनों तरबूजों को अपने मुँह में लेकर चूसने लगा, जिससे उनका पूरा बदन कांपने लगा था।
अब समय आ गया था कि मैं उनके निचले अंगों की गहराई को महसूस करूँ। मैंने उनकी साड़ी और पेटीकोट को नीचे सरका दिया, जिससे उनकी रेशमी और गहरी खाई मेरे सामने उजागर हो गई। उस खाई के आसपास के काले बाल ओस की बूंदों की तरह गीले हो चुके थे। जैसे ही मैंने अपना हाथ वहाँ रखा, मुझे महसूस हुआ कि उनकी खाई पूरी तरह से गीली और गर्म हो चुकी थी। मेरी उंगली से उस खाई में जैसे ही हलचल हुई, नीलम मैम ने अपना सिर पीछे की तरफ झुका लिया और जोर-जोर से आहें भरने लगीं। वह अब पूरी तरह से मेरे नियंत्रण में थीं और उनकी हर सिसकी मेरी उत्तेजना को बढ़ा रही थी।
उधर, मेरा खीरा भी अपनी सीमाएं लांघने के लिए बेताब था। वह पूरी तरह से सख्त और गरम हो चुका था। नीलम मैम ने जब मेरे खीरे को अपने कोमल हाथों में पकड़ा, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने झुककर धीरे से मेरे खीरे को अपने मुँह में लेना शुरू किया। उनकी गर्म जुबान जब मेरे खीरे के ऊपरी हिस्से को चाट रही थी, तो मुझे स्वर्ग का अहसास हो रहा था। उन्होंने बड़े ही प्यार से खीरा चूसना जारी रखा, जिससे मेरा पूरा शरीर झनझना उठा। अब हम दोनों के बीच की दूरी पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी और असली खेल शुरू होने वाला था।
मैंने उन्हें घास के उस नरम बिस्तर पर लिटाया और सामने से खुदाई करने की मुद्रा में आ गया। जैसे ही मेरा गर्म खीरा उनकी तंग और रसीली खाई के मुहाने पर पहुँचा, उन्होंने मुझे कसकर जकड़ लिया। मैंने एक झटके में अपने खीरे को उनकी खाई के अंदर धकेल दिया। एक गहरी कराह उनके हलक से निकली और उनकी आँखों से खुशी के आंसू झलक आए। ‘आह समीर… तुम बहुत गहरे जा रहे हो,’ वह बुदबुदाईं। मैंने धीरे-धीरे अपनी रफ्तार बढ़ानी शुरू की। हर धक्के के साथ मेरा खीरा उनकी खाई की गहराइयों को नाप रहा था और उनके तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे।
खुदाई की यह प्रक्रिया अब और भी तेज और दमदार हो गई थी। हम दोनों का पसीना एक-दूसरे के शरीर में मिल रहा था। मैंने उन्हें घुमाया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। इस स्थिति में मेरा खीरा और भी गहराई तक जा रहा था। वह अपने हाथों से जमीन को पकड़कर जोर-जोर से चिल्ला रही थीं, ‘हाँ समीर, और तेज… और गहरा खोदो!’ उनकी इस आवाज़ ने मुझे पागल कर दिया था। हम दोनों ही अब अंत के करीब थे। कुछ ही पलों के बाद, हम दोनों का रस एक साथ छूटने लगा। मेरा खीरा उनके भीतर अपना सारा रस छोड़ रहा था और उनकी खाई भी रस से सराबोर हो चुकी थी।
सब कुछ शांत होने के बाद हम दोनों उसी घास पर एक-दूसरे की बाहों में लेटे हुए थे। नीलम मैम का सिर मेरी छाती पर था और उनकी साँसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। उनकी हालत उस वक्त देखने लायक थी, बिखरे हुए बाल, सूजे हुए होंठ और चेहरे पर एक अजीब सी तृप्ति। उन्होंने धीरे से कहा, ‘आज तुमने मेरी बरसों की प्यास बुझा दी समीर।’ उस रात उस पुराने बगीचे के सन्नाटे में हमने न सिर्फ शारीरिक सुख पाया, बल्कि अपनी रूहों के उस अधूरेपन को भी भर दिया जो इतने सालों से हमें कचोट रहा था।