जवान सौतेली माँ चु@@ई—>
घर के उस बड़े से सन्नाटे में समर अपने बिस्तर पर लेटा हुआ छत को निहार रहा था, जबकि बाहर दोपहर की धूप अपनी पूरी तपिश बिखेर रही थी। घर में समर के पिता के बिजनेस ट्रिप पर जाने के बाद सिर्फ वह और उसकी जवान सौतेली माँ अंजलि ही बचे थे। अंजलि की उम्र अभी मात्र चौंतीस साल थी और उसकी देह की बनावट ऐसी थी कि कोई भी उसे देखते ही मदहोश हो जाए। समर हमेशा से अंजलि के प्रति एक अजीब सा आकर्षण महसूस करता था, जो आज की इस तन्हाई में और भी गहरा होता जा रहा था।
अंजलि का शरीर बेहद सुडौल और कामुक था, जिसे देखकर समर की धड़कनें अक्सर अनियंत्रित हो जाती थीं। अंजलि के पास दो बड़े और रसीले तरबूज थे जो साड़ी के ब्लाउज को फाड़कर बाहर आने को बेताब लगते थे। जब वह चलती थी, तो उसके पिछवाड़े की थिरकन समर के मन में तूफ़ान खड़ा कर देती थी। उसके तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर जैसे उभार साड़ी के पतले कपड़े से भी साफ झलकते थे, जिन्हें देखकर समर का खीरा अपने आप ही कड़ा होने लगता था और पैंट के अंदर अपनी जगह बनाने के लिए छटपटाता था।
उस दिन अंजलि ने हल्के नीले रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी हुई थी, जो उसके गोरे बदन पर बिजली की तरह चमक रही थी। वह रसोई में काम कर रही थी और पसीने की कुछ बूंदें उसकी गर्दन से फिसलकर उसके भारी तरबूजों की घाटी में समा रही थीं। समर पास ही खड़ा उसे देख रहा था और अंजलि भी उसकी नजरों की तपिश को महसूस कर रही थी। दोनों के बीच एक अनकहा सा खिंचाव था, जो शब्दों से परे था। अंजलि ने पलटकर देखा और समर की आँखों में छिपी भूख को पहचान लिया, जिससे उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान और शर्म की लाली दौड़ गई।
अचानक अंजलि के पैर में हल्की सी मोच आ गई और वह लड़खड़ाकर गिरने ही वाली थी कि समर ने उसे अपनी बाहों में थाम लिया। अंजलि का भारी शरीर समर के सीने से सट गया और उसके नरम तरबूज समर की छाती पर दब गए। समर के खीरे ने जैसे ही अंजलि के जांघों के ऊपरी हिस्से को छुआ, अंजलि के मुंह से एक दबी हुई आह निकल गई। समर ने धीरे से कहा, माँ आपको चोट तो नहीं लगी, लेकिन अंजलि की आँखों में दर्द से ज्यादा एक अजीब सी तड़प और प्यास साफ नजर आ रही थी जो सालो से दबी हुई थी।
समर ने उसे उठाकर सोफे पर बिठाया और धीरे से उसके पैरों को सहलाने लगा। अंजलि की साड़ी का पल्लू खिसककर एक तरफ गिर गया था, जिससे उसके उभरे हुए तरबूज और उन पर लगे मटर साफ दिखाई दे रहे थे। समर का हाथ धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ने लगा और उसने झिझकते हुए अंजलि की कमर को छुआ। अंजलि ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक लंबी सांस भरी। उस पहले स्पर्श ने दोनों के बीच की झिझक की दीवार को पूरी तरह से गिरा दिया था और अब सिर्फ जिस्मानी तलब का खेल शुरू होना बाकी था।
समर का हाथ अब अंजलि के रेशमी तरबूजों पर पहुंच चुका था। उसने अपनी उंगलियों से उन रसीले फलों को सहलाया और धीरे से मटर को अपनी उंगलियों के बीच दबाया। अंजलि की कराह पूरे कमरे में गूंज उठी और उसने समर के सिर को अपनी छाती से चिपका लिया। समर ने अपना मुंह अंजलि के एक मटर पर रखा और उसे धीरे-धीरे चूसने लगा। अंजलि का पूरा शरीर कांपने लगा था और उसकी खाई से अब कुदरती रस की बूंदें टपकने लगी थीं, जो उसकी गीली होती जा रही पेटीकोट से महसूस की जा सकती थीं।
जैसे-जैसे उत्तेजना बढ़ रही थी, समर ने अंजलि की साड़ी को पूरी तरह से उतार दिया। अब अंजलि बिना कपड़ों के उसके सामने खड़ी थी, उसका शरीर कुदरत का एक अनमोल तोहफा लग रहा था। समर ने अंजलि को धीरे से लिटाया और उसकी जांघों के बीच मौजूद उस गहरी खाई को निहारने लगा। वहाँ के बाल किसी रेशमी कालीन की तरह लग रहे थे। समर ने नीचे झुककर अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया। अंजलि अपने कूल्हों को हवा में उठाकर समर के चेहरे को अपनी खाई में और गहराई से धकेलने लगी, मानो वह सब कुछ पी जाना चाहती हो।
अंजलि ने तड़पते हुए समर की पैंट खोली और उसके विशाल खीरे को बाहर निकाला। समर का खीरा अब पूरी तरह से सीधा और सख्त हो चुका था, जो खुदाई के लिए तैयार था। अंजलि ने उस खीरे को अपने हाथों में लिया और उसे अपने गुलाबी होंठों के बीच भरकर चूसना शुरू किया। वह हर इंच को अपने मुंह में ले रही थी और समर की सांसें उखड़ने लगी थीं। अंजलि का खीरा चूसना इतना प्रभावी था कि समर को महसूस हुआ कि उसका रस बस निकलने ही वाला है, लेकिन उसने खुद को काबू किया क्योंकि उसे अभी लंबी खुदाई करनी थी।
समर ने अंजलि को पलटा और उसे पिछवाड़े से खोदने वाली मुद्रा में ला दिया। अंजलि का भारी पिछवाड़ा अब समर के सामने था और उसकी खाई पीछे से साफ नजर आ रही थी। समर ने अपने खीरे की नोक को अंजलि की गीली खाई के मुहाने पर रखा और एक जोरदार धक्का दिया। खीरा आधा अंदर धंस गया और अंजलि ने जोर से चीख मारी, जो दर्द और आनंद का मिला-जुला अहसास था। समर ने धीरे-धीरे अपनी रफ्तार बढ़ाई और अंजलि के पिछवाड़े को पकड़कर गहरी खुदाई शुरू कर दी। हर धक्के के साथ अंजलि के तरबूज जोर-जोर से हिल रहे थे।
खुदाई अब अपने चरम पर थी। समर ने अंजलि को सीधा लिटाया और सामने से खोदना शुरू किया। अंजलि ने अपनी टांगें समर की कमर पर लपेट लीं और उसे अपने और करीब खींच लिया। समर की सांसें तेज हो रही थीं और अंजलि के मुंह से निकलने वाली सिसकारियां कमरे की हवाओं में घुल रही थीं। समर ने अंजलि के होंठों को अपने होंठों से दबा दिया और तेजी से अपना खीरा उस खाई के अंदर-बाहर करने लगा। अंजलि चिल्ला रही थी, और खोदो समर, मुझे पूरी तरह से भर दो, आज मुझे चैन दे दो।
अंजलि की खाई अब पूरी तरह से गर्म और गीली हो चुकी थी। समर ने अपनी रफ्तार को और बढ़ा दिया, वह किसी जंगली जानवर की तरह अंजलि के शरीर को जोत रहा था। अंजलि का शरीर धनुष की तरह तन गया था और उसकी आँखें चढ़ने लगी थीं। अचानक अंजलि का पूरा बदन थरथराने लगा और उसकी खाई से गरम रस का फव्वारा छूट पड़ा। उसी समय समर ने भी अपना पूरा खीरा गहराई तक डाल दिया और अपने खीरे से निकलता सारा गरम रस अंजलि की गहराई में उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे में सिमटे हुए बिस्तर पर ढह गए।
खुदाई खत्म होने के बाद कमरे में सिर्फ दोनों की भारी सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। अंजलि का गोरा बदन पसीने से तरबतर था और उसके चेहरे पर एक असीम संतुष्टि का भाव था। समर ने उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके माथे को चूमा। अंजलि ने धीरे से कहा, तुमने मुझे आज वो सुख दिया है जो मैंने कभी सोचा भी नहीं था। उस दिन के बाद उनके बीच का रिश्ता सिर्फ सौतेली माँ और बेटे का नहीं रहा, बल्कि वे एक-दूसरे की रूह और जिस्म के सबसे करीबी साथी बन गए थे, जिनकी यह गुप्त दुनिया बाहर की दुनिया से छिपी हुई थी।
अगली सुबह जब सूरज की किरणें फिर से कमरे में आईं, तो अंजलि और समर एक-दूसरे की बाहों में बंधे हुए थे। अंजलि का पिछवाड़ा अभी भी समर की जांघों से सटा हुआ था और समर का हाथ उसके भारी तरबूजों पर रखा था। वह रात उनके जीवन की सबसे यादगार रात बन चुकी थी। उन्होंने तय किया कि जब भी उन्हें मौका मिलेगा, वे इसी तरह अपनी प्यास बुझाते रहेंगे। अंजलि ने मुस्कुराते हुए समर के खीरे को फिर से सहलाया, जिससे साफ़ था कि अब यह सिलसिला रुकने वाला नहीं था और खुदाई का यह खेल आगे भी जारी रहेगा।