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रिया चाची की खुदाई

रिया चाची की उम्र करीब बत्तीस साल थी, लेकिन उनके शरीर की बनावट किसी बीस साल की नवयौवना को भी मात देती थी। जब वह अपनी पीली सूती साड़ी पहनकर रसोई में काम करती थीं, तो उनकी कमर का उतार-चढ़ाव और उनके भारी भरकम तरबूज साड़ी के पतले कपड़े से साफ झलकते थे। समीर पिछले दो महीनों से शहर में अपनी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए चाची के घर पर ही रुका हुआ था। चाची के पति, यानी समीर के चाचा, काम के सिलसिले में अक्सर शहर से बाहर रहते थे, जिससे घर में अक्सर सन्नाटा पसरा रहता था। समीर अक्सर अपनी किताबों में डूबा रहता, लेकिन उसका ध्यान अक्सर रसोई से आने वाली चाची की चूड़ियों की खनक और उनकी पायल की आवाज़ पर ही टिका रहता था। चाची का रंग गेंहुआ था और उनकी आँखों में एक अजीब सी तड़प और अकेलापन हमेशा तैरता रहता था, जिसे समीर अपनी जवान आँखों से बखूबी पढ़ सकता था।

उस दोपहर गर्मी अपने चरम पर थी और लू के थपेड़े खिड़कियों से टकरा रहे थे, घर के सभी लोग सो रहे थे सिवाय समीर और रिया चाची के। चाची अपने कमरे में बेड पर लेटी हुई थीं, गर्मी की वजह से उन्होंने साड़ी का पल्लू एक तरफ गिरा दिया था, जिससे उनके गोल और रसीले तरबूज ब्लाउज की तंग सीमाओं को तोड़ने के लिए बेताब दिख रहे थे। समीर पानी पीने के बहाने उनके कमरे के पास से गुजरा और उसकी नज़र चाची के खुले बदन पर पड़ गई। उसके खीरे में अचानक एक हलचल सी हुई और उसे अपनी रगों में खून का बहाव तेज़ महसूस होने लगा। चाची की सांसें तेज़ चल रही थीं और उनके मटर साड़ी के पतले कपड़े के नीचे से साफ तौर पर उभरे हुए नज़र आ रहे थे, जो किसी भी मर्द को पागल करने के लिए काफी थे। समीर वहीं खड़ा रह गया और उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह वहां से हिल सके।

चाची ने अचानक आँखें खोलीं और समीर को दरवाजे पर खड़ा देख पहले तो थोड़ा सकपकाईं, लेकिन फिर उनकी आँखों में एक शरारत भरी चमक आ गई। उन्होंने अपनी साड़ी ठीक करने की कोई कोशिश नहीं की, बल्कि समीर को पास आने का इशारा किया और धीमी आवाज़ में कहा कि समीर, ज़रा पंखा देखोगे, शायद इसकी स्पीड कम हो गई है। समीर के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं, वह धीरे-धीरे उनके करीब गया और उसकी नज़रे चाची के गहरे गले और उनके भारी तरबूजों पर टिक गई थीं। जैसे ही वह पंखे का स्विच चेक करने के लिए झुका, उसका हाथ गलती से चाची के कंधे से छू गया। वह स्पर्श इतना बिजली भरा था कि समीर के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। चाची ने भी कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वह और करीब आ गईं, उनके शरीर से आती एक भीनी-भीनी खुशबू समीर के होश उड़ा रही थी।

समीर ने हिम्मत जुटाकर चाची की कमर पर हाथ रखा, जो बेहद नरम और रेशमी थी, और धीरे से उन्हें अपनी ओर खींचा। चाची ने अपनी आँखें मूंद लीं और एक गहरी आह भरी, जैसे वह सालों से इसी स्पर्श का इंतज़ार कर रही थीं। समीर ने अपने होंठ उनके गर्दन के पास ले जाकर उन्हें चूमना शुरू किया, जिससे चाची के शरीर में एक कंपन पैदा हो गई। उनकी सांसें गर्म हो गई थीं और वह समीर के बालों में अपनी उंगलियां फंसाकर उसे और करीब खींचने लगीं। समीर अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था, उसने चाची की साड़ी का पल्लू पूरी तरह हटा दिया और उनके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने लगा। जैसे ही ब्लाउज खुला, दो विशाल और गोरे तरबूज आज़ाद होकर बाहर आ गए, जिनके मटर उत्तेजना के मारे पूरी तरह सख्त हो चुके थे।

समीर ने बिना देर किए एक तरबूज को अपने मुंह में भर लिया और उसे पागलों की तरह चूसने लगा, जबकि चाची की सिसकारियां कमरे की शांति को भंग करने लगीं। वह बार-बार ‘ओह समीर, तुम बहुत शैतान हो’ कह रही थीं, लेकिन उनके हाथ समीर को रुकने का इशारा नहीं कर रहे थे। समीर ने अब चाची की साड़ी और पेटीकोट के नाड़े को ढीला किया और उन्हें पूरी तरह से निर्वस्त्र कर दिया। चाची की खाई अब उसके सामने थी, जो पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहां के काले घने बाल उसकी कामुकता को और बढ़ा रहे थे। समीर ने अपनी उंगली से खोदना शुरू किया, तो चाची का शरीर धनुष की तरह तन गया और वह बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींचने लगीं। खाई से निकलने वाला रस समीर की उंगलियों पर चिपक गया था।

अब बारी समीर की थी, उसने अपने कपड़े उतारे और उसका साढ़े सात इंच का खीरा पूरी तरह से अकड़कर ऊपर की ओर तना हुआ था। चाची ने जब उस विशाल खीरे को देखा, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गई और उन्होंने तुरंत उसे अपने कोमल हाथों में थाम लिया। उन्होंने झुककर खीरा मुंह में लेना शुरू किया और उसे किसी लॉलीपॉप की तरह बड़े चाव से चूसने लगीं। समीर को ऐसा सुख मिल रहा था जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। वह चाची के सिर को पकड़कर अपने खीरे को उनके हलक तक उतारने लगा, जिससे चाची की आँखों से पानी आने लगा लेकिन उन्होंने रुकने का नाम नहीं लिया। खीरा अब पूरी तरह से लार से भीग चुका था और अपनी मंज़िल की ओर बढ़ने के लिए बेताब था।

समीर ने चाची को बिस्तर पर लिटाया और उनके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया, यह सामने से खोदना वाला सबसे बेहतरीन आसन था। उसने अपने खीरे की नोक को चाची की गीली खाई के मुहाने पर रखा और एक ही झटके में आधा अंदर उतार दिया। चाची के मुंह से एक चीख निकल गई और उन्होंने समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। खाई बहुत तंग थी, लेकिन रस की वजह से खीरा धीरे-धीरे अंदर समाने लगा। समीर ने अब रफ़्तार पकड़ ली और ज़ोर-ज़ोर से धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ चाची के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके मटर समीर की छाती से रगड़ खा रहे थे। कमरे में सिर्फ गोश्त के टकराने की आवाज़ें गूंज रही थीं, जो खुदाई के इस खेल को और भी रोमांचक बना रही थीं।

कुछ देर बाद समीर ने चाची को उल्टा किया और उन्हें घोड़ी बना दिया, पिछवाड़े से खोदना चाची को बहुत पसंद आ रहा था। समीर ने पीछे से उनके दोनों तरबूजों को पकड़ लिया और अपने खीरे को पूरी ताकत से उनकी खाई में उतारने लगा। चाची पागलों की तरह सिर हिला रही थीं और उनकी सिसकारियां अब कराहों में बदल चुकी थीं। वह चिल्ला रही थीं, ‘हाँ समीर, और तेज़, मुझे पूरी तरह से खोद डालो, आज कोई कसर मत छोड़ना।’ समीर ने अपनी गति और बढ़ा दी, उसका शरीर पसीने से नहा चुका था लेकिन उसकी ऊर्जा कम होने का नाम नहीं ले रही थी। खुदाई का यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा, चाची का शरीर अब पूरी तरह से ढीला पड़ने लगा था क्योंकि उनका रस निकलने ही वाला था।

अंत में, जब दोनों अपनी चरम सीमा पर थे, समीर ने एक आखिरी और बहुत ज़ोरदार धक्का मारा और उसका सारा सफेद रस चाची की खाई के अंदर गहराई में छूट गया। ठीक उसी पल चाची का भी रस निकलना शुरू हुआ और वह थरथराते हुए समीर के नीचे ढेर हो गईं। दोनों काफी देर तक एक-दूसरे की बांहों में लिपटे रहे, उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। चाची के चेहरे पर एक गजब का संतोष और चमक थी, उन्होंने समीर के माथे को चूमा और धीरे से मुस्कुराते हुए कहा कि तुमने तो आज मुझे तृप्त कर दिया। उस दिन के बाद से, वह घर सिर्फ एक मकान नहीं रहा, बल्कि उनके प्यार और इस गुप्त खुदाई का एक मंदिर बन गया, जहाँ हर दोपहर एक नई कहानी लिखी जाती थी।

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